मंगलवार, 6 जून 2023

🔥भारत और चीन युद्ध{India and china war}

👉भारत और चीन :-

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत ने सबसे पहले चीन की च्यांगकाई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सरकार के साथ अपने राजनयिक सम्बंध स्थापित किये। 1 अक्टूबर, 1949 को चीन में स्थापित माओत्से तुंग की साम्यवादी सरकार को भारत ने दिसंबर 1949 में अपनी मान्यता दे दी तथा उसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलाने हेतु भरपूर समर्थन दिया। इस प्रकार आजादी के बाद से ही भारत ने चीन के प्रति मित्रतापूर्वक संबंधों का निर्वहन किया, किंतु इसके परिणाम भारत के लिए घोर निराशाजनक साबित हुए।

✨भारत-चीन के बीच उत्पन्न तनावों को समझने के लिए तिब्बत में चीन की गतिविधियों, सीमाविवादों तथा 1962 के चीनी आक्रमण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को जानना आवश्यक है।
👉• तिब्बत विवादः अक्टूबर 1950 में चीन की जनमुक्ति सेना ने तिब्बत पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया। तिब्बत, भारत एवं चीन के मध्य एक 'बफर राज्य के रूप में स्थापित था। तिब्बत क्षेत्र में 2000 मील को सीमा पर ब्रिटिश शासनकाल से ही भारत को नियंत्रण का अधिकार प्राप्त था। चीन की इस आक्रामक कार्यवाही से विचलित होने के बावजूद भारत ने उसके साथ मित्रतापूर्ण संबंध कायम रखने का निर्णय किया और 1954 में चीन के साथ साँध करके तिब्बत पर उसके अधिकार को मान्यता दे दी। इस संधि में भारत एवं चीन के आपसी संबंधों के निर्देशक के रूप में पंचशील सिद्धांतों को शामिल किया गया। उक्त संधि के तहत भारत ने चीन को दिल्ली, कलकत्ता और कलिंगयोंग में अपने वाणिज्यिक अभिकरण स्थापित करने की सुविधा प्रदान की, जबकि चीन ने भारत को तिब्बत में अपना व्यापार केंद्र स्थापित करने की छूट दी।

चीन द्वारा सुनियोजित ढंग से तिब्बत की स्वायत्तता कम करते जाने के प्रयासों के फलस्वरूप मार्च 1959 में तिब्बत में एक जनविद्रोह भड़क उठा। चीन ने इस विद्रोह को दमनपूर्ण उपायों द्वारा कुबल दिया, जिसका भारत में जनता के स्तर पर गंभीर विरोध किया गया। भारत द्वारा धर्मगुरु दलाईलामा तथा उनके अनुयायियों को राजनैतिक शरण प्रदान की गई, किंतु भारत सरकार ने तिब्बत सरकार को कोई मान्यता नहीं दी। फिर भी चीन द्वारा सुरूप ये भारत को तिब्बत में विद्रोह भड़काने काजिम्मेदार ठहराया गया और 1959 में लोंगण तथा लद्दाख क्षेत्र में 12000 वर्ग मी भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया गया। सितंबर 1959 में भारत-चीन सम्बंधों पर पहला श्वेतपत्र भारतीय संसद में पेश किया गया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के सामने  किया गया कि 1954 के समझौते के शैशवकाल में ही भारत और चीन की सेनाएं सीमाक्षेत्र में तनावपूर्ण वातावरण में तैनात थीं दोनों देशों के मध्य सीमा समस्या पर 1 अनेक विरोधपत्रों, स्मरणपत्रों तथा झापनों का आदान-प्रदान भी हुआ, जिनमें दोनों देशों द्वारा अपने-अपने दावे पेश किये गये थे।

• भारत-चीन सीमा पर तनावः चीन ने भारत के 40000 वर्गमील क्षेत्र पर अपना दावा पेश किया और भारतीय सीमा का उल्लंघन करना प्रारंभ कर दिया। चीन का दावा था कि भारतीय सरकार और चीन की केंद्रीय सरकार के मध्य ऐतिहासिक तौर पर कोई संधि नहीं हुई थी। उसने पहले से स्थित मैकमोहन रेखा को अवैध किया, क्योंकि यह चीन के तिब्बती क्षेत्र पर ब्रिटिश आक्रामक नीतियों का परिणाम थी।

दूसरी ओर, भारत का मानना था कि दोनों देशों के बीच स्थित ऐतिहासिक सीमाएं उच्चतम जलप्रवाह के भौगोलिक सिद्धांत पर आधारित थीं और अधिकांश क्षेत्र में दोनों देशों की तत्कालीन सरकारों द्वारा सम्पन्न विशिष्ट समझीतों में उन सीमाओं को मान्यता दी गयी थी। 1959-62 के मध्य चीन द्वारा निरंतर भारतीय सीमाओं का उल्लंघन करने के बावजूद भारत ने शांतिपूर्ण उपायों द्वारा ही सीमा विवाद को सु के प्रयास किये। दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा कई बार आपसी वार्ताएं की गई। अप्रैल 1960 में चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने भी भारत यात्रा की। किंतु सम का कोई समाधान नहीं खोजा जा सका।

✨• भारत पर चीनी आक्रमण (1962): 8 सितंबर, 1962 को चीनी सेनाओं ने सोचे-विचारे ढंग से उत्तरी-पूर्वी सीमांत एजेंसी (नेफा, आधुनिक अरुणाचल प्रदेश) क्षेत्र में मैकमोहन रेखा का अतिक्रमण कर लिया। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने ख से नेफा तक की समूची सीमा पर पूरी तरह आक्रमण कर दिया। चीन के इस गंभीर और जबरदस्त आक्रमण के समक्ष भारतीय सेनाओं को हार का सामना करना पड़ा और एक बड़े भारतीय भू-भाग पर चीन का आधिपत्य स्थापित हो गया। युद्ध के दौरान भारत को पश्चिमी शक्तियों तथा सोवियत संघ दोनों से सहायता प्राप्त हुई। 21 न 1962 को चीन द्वारा नाटकीय ढंग से समूचे सीमा क्षेत्र में युद्धविराम की एकतरफ घोषणा कर दी गयी और वास्तविक नियंत्रण रेखा से 20 किमी. पीछे हटने का ला किया गया। लेकिन इसके बावजूद भी लद्दाख का एक बड़ा भाग तथा और दक्षिणी चीन को जोड़ने वाले सामरिक महत्व के क्षेत्र पर चीन का कब्जा जमाए चीन द्वारा भारत को यह चेतावनी भी दी गयी कि यदि भारत पूर्वी क्षेत्र की वास्ति नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ा अथवा मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र की वास्तविक निर्वाण से पीछे हटने को राजी नहीं होता है, तो वह भारत पर पुनः आक्रमण करेगा।
इसी मध्य 1962 में 6 एफ्रो एशियाई देशों- इंडोनेशिया म्यांमार, संयुक्त अरब गणराज्य, पाना, श्रीलंका द्वारा 'कोलंबो प्रस्ताव' के माध्यम से दोनों देशों के मध्य समझौता कराने का प्रयास किया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार, चीन को पारंपरिक सीमा रेखा से 20 किमी. पीछे हटाने, पूर्वी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा को दोनों देशों द्वारा युद्धविराम रेखा के रूप में स्वीकार करने तथा मध्यक्षेत्र में यथास्थिति कायम रखे जाने का प्रावधान था।

भारत ने कोलंबो प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान कर दी, किंतु चीन ने मैकमोहन रेखा पर भारतीय सेना की तैनाती और असैनिक घोषित क्षेत्र में नागरिक चौकी स्थापित करने के अधिकार को चुनौती देते हुए उक्त प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। इस प्रकार भारत-चीन के मध्य सम्बंधों में गतिरोध बना रहा।

रविवार, 4 जून 2023

भारत-पाकिस्तान-संबंध..(reason of battle and undevelopment)

भारत-पाकिस्तान:-
पाकिस्तान और भारत के बीच संबंध सदैव ही कटु रहे हैं और इसका कारण पाकिस्तान और भारत के विभाजन के तरीके में निहित है। 1947 के विभाजन से दोनों ही देशों के सम्मुख कुछ नई समस्याएं खड़ी हो गई। दोनों देश अस्त्रों की होड़ में लग गए, जिसके परिणामस्वरूप भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। इस कारण दोनों देशों के विकास में बाधा खड़ी हुई। आरंभ से ही पाकिस्तान सभी क्षेत्रों में भारत की बराबरी करने की कोशिश कर रहा था। उसकी दूसरी समस्या अपनी अलग पहचान बनाने की भी थी। पाकिस्तान की प्रतिरक्षा की दृष्टि में भारत का आकार, जनसंख्या, संसाधन और कार्यक्षमताएं गंभीर चुनौती बने हुए थे। इसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में विशेष रूप से संलग्न रहा। इस उद्देश्य से उसने विश्व के अनेक देशों से सैनिक सहायता मांगी। पाकिस्तान पश्चिमी गुट में शामिल हो गया और इस प्रकार वह भी शीत युद्ध का भागीदार बन गया। भारत ने भी प्रतिरक्षा के लिए अपनी सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया। हालांकि, भारत ने सदैव एक साथ बैठकर विभिन्न मुद्दों के समाधान निकालने की वकालत की।

कश्मीर मामला
कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम् समस्या बना रहा। भारत ने 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर को अपना हिस्सा बना लिया, लेकिन पाकिस्तान इसे मानने के लिए तैयार नहीं था और उसने जनजातीय कबीलों की आड़ में छुपकर आक्रमण किया। भारत ने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को कश्मीर से खदेड़ दिया। इसमें शेख अब्दुल्लाह के नेतृत्व में जन-समुदाय ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दुर्भाग्यपूर्ण है, कि भारत ने इस काम को पूरा किए बगैर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में शिकायत दर्ज कर दी। यह मामला जनवरी, 1948 में दर्ज किया गया, फलतः 1 जनवरी, 1949 को युद्ध-विराम की घोषणा की गई। 1947 में, भारत ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के अंतर्गत कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव रखा लेकिन 1955 में कुछ बदली हुई परिस्थितियों के कारण, इसे वापस ले लिया गया। हालांकि, कश्मीर के मामले पर संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक लड़ाई चलती रही, लेकिन युद्ध की स्थिति 1964 तक नहीं आई। लेकिन कश्मीर की समस्या का कोई समाधान नहीं निकला और दोनों देशों के संबंधों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। वस्तुतः अब दोनों देश, अपनी सीमा की रक्षा करने को तत्पर हो गए और इनमें से कोई भी बलपूर्वक इसे बदलने की इच्छा व्यक्त नहीं करता।

सिंधु नदी जल विवादः 
विभाजन ने अनेक समस्याएं उत्पन्न कीं, जिनमें से एक है-सिंधु नदी जल बंटवारा। दोनों देश सिंधु और उसकी सहायक नदियों के जत का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहते थे। भारत और पाकिस्तान खाद्यान्न में आत्मनिर्भर होना चाहते थे, अतः वे सिंधु के जल का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहते थे। विभाजन के बाद, सिंधु नदी से सिंचित होने वाले 280 लाख एकड़ क्षेत्र में 50 लाख एकड़ भूमि भारत के पास रह गई। अधिकांश पश्चिमी नदियां समुद्र में मिल जाती थीं। जबकि पाकिस्तानी नहरें पूर्वी नदियों पर आश्रित थीं। इन नदियों का पानी पूर्वी पंजाब से होकर पाकिस्तान में जाता था। भारत का कृषि विकास भी रावी. व्यास और सतलज जैसी पूर्वी नदियों के जल पर आश्रित था। पाकिस्तान की नहरों का वह भाग, जो नदी से जुड़ा था, भारतीय भू-भाग में पड़ता था। तनाव का कारण यही था।
पाकिस्तान में बाढ़ आने या अकाल पड़ने पर पाकिस्तानी शासक भारत को दोषी ठहराते थे। उन्होंने पानी की समस्या के लिए भारत को दोषी ठहराया और न्याय संगत बंटवारे की मांग की। दूसरी ओर, भारत इस समस्या को सुलझाने के लिए तत्पर था। विश्व बैंक की देखरेख में 17 अप्रैल, 1759 को वाशिंगटन में नहर के जल के बंटवारे से संबंधित अंतरिम समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापक समझौतों का एक सिलसिला चला। 19 सितम्बर, 1969 को करांची में नहर जलसंधि पर हस्ताक्षर किए गए।

शुक्रवार, 2 जून 2023

गांधीजी की भारत वापसी ,चम्पारण सत्याग्रह (1917)

गांधीजी की भारत वापसी:--

गांधीजी, जनवरी 1915 में भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष और उनकी सफलताओं ने उन्हें भारत में अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया था। न केवल शिक्षित भारतीय अपितु जनसामान्य भी गांधीजी के बारे में भलीभांति परिचित हो चुका था। गांधीजी ने निर्णय किया कि वे अगले एक वर्ष तक समूचे देश का भ्रमण करेंगे तथा जनसामान्य की यथास्थिति का स्वयं अवलोकन करेंगे। उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि फिलहाल वह किसी राजनीतिक मुद्दे पर कोई सार्वजनिक कदम नहीं उठायेंगे। भारत की तत्कालीन सभी राजनीतिक विचारधाराओं से गांधीजी असहमत थे। नरमपंथी राजनीति से उनकी आस्था पहले ही खत्म हो चुकी थी तथा वे होमरूल आंदोलन की इस रणनीति के भी खिलाफ थे कि अंग्रेजों पर कोई भी मुसीबत उनके लिये एक अवसर है। यद्यपि होमरूल आंदोलन इस समय काफी लोकप्रिय था किन्तु इसके सिद्धांत गांधीजी के विचारों से मेल नहीं खाते थे। उनका मानना था कि ऐसे समय में जबकि ब्रिटेन प्रथम विश्व युद्ध में उलझा हुआ है, होमरूल आंदोलन को जारी रखना अनुचित है। उन्होंने तर्क दिया कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रवादी लक्ष्यों को प्राप्त करने सर्वोत्तम मार्ग है--अहिंसक सत्याग्रह। 

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषित किया कि जब तक कोई राजनीतिक संगठन सत्याग्रह के मार्ग को नहीं अपनायेगा तब तक वे ऐसे किसी भी संगठन से सम्बद्ध नहीं हो सकते। तीन संघर्थी- चम्पारण आंदोलन (बिहार) तथा अहमदाबाद और खेड़ा (दोनों रौलेट सत्याग्रह प्रारम्भ करने से पहले, 1917 और 1918 के आरम्भ में गांधीजी गुजरात) सत्याग्रह में हिस्सा लिया। ये तीनों ही आंदोलन स्थानीय आर्थिक मांगों से सम्बद्ध थे। इनमें अहमदाबाद का आंदोलन, औद्योगिक मजदूरों का आंदोलन था तथा धम्पारण और खेड़ा किसान आंदोलन थे।
चम्पारण सत्याग्रह (1917) -
 प्रथम सविनय अवज्ञा शरण का मामला काफी पुराना था। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में गोरे बागान निकों ने किसानों से एक अनुबंध करा लिया, जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी भूमि के 3-20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था। यह व्यवस्था तिनकारियाद्ध के नाम से जानी जाती थी। 19वीं सदी के अंत में जर्मनी में रासायनिक रंग का विकास हो गया, जिसने नील को बाजार से बाहर खदेड़ दिया। इसके कारण चम्पारण के बागान मालिक नील की खेती बंद करने को विवश हो गये। किसान भी मजबूरन नील की खेती से छुटकारा पाना चाहते थे किन्तु परिस्थितियों को देखकर गोरे मालिक किसानों की विवशता का फायदा उठाना चाहते थे। उन्होंने दूसरी फसलों की खेती करने के लिये किसानों को अनुबंध से मुक्त करने की एवज में लगान अन्य करों की दरों में अत्यधिक वृद्धि कर दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने द्वारा तय की गयी दरों पर किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिये बाध्य किया। चम्पारण से जुड़े एक प्रमुख आंदोलनकारी राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को चम्पारण बुलाने का फैसला किया।

फलतः गांधीजी, राजेन्द्र प्रसाद, बृज किशोर, मजहर उल-हक, महादेव देसाई, नरहरि जे.बी. कृपलानी के सहयोग से मामले की जांच करने चम्पारण पहुंचे। गांधीजी के चम्पारण पहुंचते ही अधिकारियों ने उन्हें तुरन्त चम्पारण से चले जाने का आदेश दिया। किन्तु गांधीजी ने इस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया तथा किसी भी प्रकार के दंड करें भुगतने का फैसला किया। सरकार के इस अनुचित आदेश के रुद्ध प्रतिरोध या सत्याग्रह का यह मार्ग चुनना विरोध का सर्वोत्तम तरीका था। गांधीजी की दृढ़ता के सम्मुख सरकार विवश हो गयी, अतः उसने स्थानीय प्रशासन को अपना आदेश वापस लेने तथा गांधीजी को चम्पारण के गांवों में जाने की छूट देने का निर्देश दिया। इस बीच सरकार ने सारे मामले की जांच करने के लिये एक आयोग का गठन किया तथा गांधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया।

 गांधीजी, आयोग को यह समझाने में सफल रहे कि तिनकाठिया पद्धति समाप्त होनी चाहिये। उन आयोग को यह भी समझाया कि किसानों से पैसा अवैध रूप से वसूला गया है, उसके लिये किसानों को हरजाना दिया जाये। बाद में एक और समझौते के पश्चात् गोरे बागान मालिक अवैध वसूली का 25 प्रतिशत हिस्सा किसानों को सीटाने पर राजी हो गये। इसके एक दशक के भीतर ही बागान मालिकों ने चम्पारण छोड़ दिया। इसके एक दशक के भीतर ही बागान मालिकों ने चम्पारण छोड़ दिया। इस प्रकार गांधीजी ने भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रथम बुद्ध सफलतापूर्वक जीत लिया। चम्पारन सत्याग्रह से सम्बद्ध अन्य लोकप्रिय नेताओं में अनुग्रह नारायण सिन्हा, रामनवमी प्रसाद एवं शंभुशरण वर्मा शामिल थे।

यूरोपीय व्यापार की संरचना और तरीके{Structure and Methods of European Trade}=>In British era

यूरोपीय व्यापार की संरचना और तरीके:-


जब यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने भारत से व्यापार करना शुरू किया तो उनके सामने एक ही समस्या थी कि भारत से लाए गए सामान के बदले भारत को किस चीज की आपूर्ति की जाए। उन्हें वित्तीयन की समस्या और एशिया के साथ प्रतिकूल व्यापार संतुलन की समस्या से जूझना पड़ा। उन्होंने सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण अमेरिका की खानों से सोना और चांदी निकालकर यूरोप को समृद्ध किया और इसका उपयोग, अनिच्छुक रूप से, पूर्व से आयातित वस्तुओं को खरीदने में भी किया। यह दर्ज किया गया कि 1660 और 1699 के बीच पूरब को निर्यातित सोना और चांदी की मात्रा कुल निर्यात का 66 प्रतिशत थी। 1680-89 के मध्य यह प्रतिशत बढ़कर 87 तक पहुंच गया। अंग्रेजों ने 1700 और 1750 के बीच 270 लाख रुपए कीमत की चांदी और 90 लाख की अन्य वस्तुएं भारत भेजीं। लेकिन 1750 के बाद औद्योगिक क्रांति के आगमन के साथ स्थितियों में परिवर्तन होना शुरू हो गया। 1760 और 1809 के बीच 140 लाख रुपए मूल्य की चांदी निर्यात की गई जबकि अन्य वस्तुओं का निर्यात 185 लाख तक बढ़ गया।

✨वाणिज्यवादी विश्वास के अनुसार, बुलियन (सोने-चांदी की ईंटें) का निर्यात किसी देश की अर्थव्यवस्था एवं समृद्धि के लिए नुकसानदेह होता है। अतः इस दौरान यूरोपीय कंपनियां पूरब की वस्तुओं के बदले दूसरी चीजें देने का विकल्प ढूंढ रही थीं। अंतर- एशियाई व्यापार पर कब्जा करके उन्होंने इस समस्या का आशिक समाधान खोजा। यूरोपीय व्यापार मसालों के द्वीप से लॉग और जापान से तांबा भारत और चीन तक पहुंचाते थे, भारतीय सूती वस्त्र को दक्षिण-पूर्व एशिया और फारसी कालीन भारत पहुंचाते थे और इस तरह भारत से आयातित माल का कुछ मूल्य चुकाते थे। हालांकि 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही, अंग्रेज व्यापार घाटे का सम्पूर्ण समाधान तभी प्राप्त कर पाए, जब अंग्रेजों ने बंगाल से राजस्व वसूलना शुरू किया और चीन को अफीम का निर्यात करने लगे।

✨सोलहवीं और सबके दौरान# गई वस्तुओं की यूरोप, अफ्रीका, अमेरिकी महाद्वीप और पूर्व से भारी मुनाफा कमाते थे। यूरोपीय शक्तियों ने यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका के बीच एक त्रिकोणीय व्यापार आरंभ किया। यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियां अमेरिका के बागानों के लिए दामों की नियुक्ति करती थीं और दाम से लाए जाते थे। इस पृष्ठभूमि में पूरव के साथ व्यापार आगे बढ़ा।

✨आरंभ से ही, यूरोपीय बाजारों में मसालों की मांग अत्यधिक थी। सोलहवीं एवं सत्रहवीं शताब्दी में काली मिर्च का व्यापार अपने उत्कर्ष पर था। हालांकि, सत्रहवीं शताब्दी का अंत होते-होते व्यापार में दूसरी वस्तुओं का भी महत्व बढ़ा। मसाले के स्थान पर कपड़ा, रेशम और शोरा का महत्व तेजी से बढ़ा। सत्रहवीं शताब्दी के दूसरे दशक से अंग्रेजी और डब कंपनियों में भारतीय वस्त्रों की मांग बढ़ गई। एशिया के दूसरे देशों में भारतीय कपड़ों की मांग बहुत थी और इसका उपयोग विनिमय वस्तु के रूप में किया जाता था। भारतीय कपड़े अपनी विविधता, उत्कृष्टता, प्रकार और डिजाइन के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरणार्थ, गुजरात, कोरोमण्डल और बंगाल में साढ़े, रंगे हुए, कढ़ाई वाले विभिन्न प्रकार के कपड़ों का उत्पादन किया जाता था। भारतीय रेशम और मलमल, मोटे और परिष्कृत दोनों प्रकार के, यूरोप और साथ ही साथ अफ्रीका और वेस्टइंडीज के बाजारों में भी पाए जाते थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1614 में अंग्रेज कंपनी ने सूरत से 12,000 कपड़े के थान की मांग की, जो 1664 में 750,000 थान से भी अधिक पहुंच गई जिसकी मात्रा कंपनी के समस्त व्यापार का 73 प्रतिशत आंकी गई। 1690 तक, कुल व्यापार में कपड़े का हिस्सा 83 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस समय यूरोप में उच्च वर्गों के बीच बंगाल के मलमल और कोरोमंडल के छींटदार कपड़ों की मांग विशेष रूप से बढ़ गई।

✨इस बढ़ते हुए आयात से अंग्रेजी उत्पादक घबरा गए और उन्होंने भारतीय वस्त्रों के आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए राजनीतिक दबाव डाला। इसके परिणामस्वरूप, अंग्रेजी सरकार ने 1700, 1721 और 1735 में विभिन्न संरक्षणवादी विनियम पारित किए। इसके अतिरिक्त सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय बाजार में कच्चे रेशम की भी मांग बढ़ी।

✨फ्रांसीसियों और अंग्रेजों द्वारा साल्टमीटर (शोरा), जिसका उपयोग बारूद बनाने में किया जाता था, की बेतहाशा मांग की गई। इसके अतिरिक्त, एक महत्वपूर्ण कच्चा माल होते हुए, शोरा, भारी वस्तु होने के कारण, का उपयोग जहाजों को संतुलित करने में भी किया जा सकता था। पटना शोरे के व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। इसी प्रकार, नील भी आयात की एक अन्य वस्तु थी जिसका उपयोग कपड़ों को रंगने में किया जाता था, क्योंकि यूरोप में सीने के लिए प्रयोग होने वाले परम्परागत पौधे की पत्तियों की तुलना में सस्ता एवं प्रयोग करने में आसान था।


निष्कर्ष->यूरोपीय व्यापार की संरचना और तरीके

बुधवार, 31 मई 2023

महात्मा गांधी ने पंडित नेहरू को अपना उत्तराधिकारी क्यों चुना!{Why did Gandhi choose Nehru as his political successor}

गांधी ने नेहरू को अपना उत्तराधिकारी क्यों चुना?

 आधुनिकता, धर्म, ईश्वर, राज्य और औद्योगीकरण पर नेहरू और गांधी के अलग-अलग विचार थे। नेहरू धर्म के प्रति उदासीन थे, जबकि गांधी जी की ईश्वर में गहरी आस्था थी। नेहरू का मानना ​​था कि औद्योगीकरण भारत में अत्यधिक गरीबी का एकमात्र समाधान था, जबकि गांधी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार का आह्वान किया। नेहरू सामाजिक सुधार और गरीबी उन्मूलन में आधुनिक राज्य की शक्ति में विश्वास करते थे। जबकि गांधी राज्य की शक्ति के प्रति शंकालु थे, और इसके बजाय व्यक्तियों और समुदायों की चेतना और इच्छा शक्ति में विश्वास करते थे। कई मतभेदों के बावजूद नेहरू ने गांधीजी का सम्मान किया और गांधी ने नेहरू पर किसी से भी ज्यादा भरोसा किया। गुरु और शिष्य दोनों में मूलभूत समानताएँ थीं। दोनों ने देशभक्ति को एक समावेशी और समग्र अर्थ में देखा। उन्होंने भारत को किसी विशेष जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म के बजाय समग्र रूप में देखा। दोनों अहिंसा और लोकतांत्रिक सरकार में विश्वास करते थे।
राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक 'द गुड बोटमैन' में लिखा है कि गांधी ने नेहरू को अपने विकल्प के रूप में स्वीकार किया, क्योंकि नेहरू ने भारत की बहुलतावादी और समावेशी प्रकृति को सबसे अधिक विश्वासपूर्वक प्रतिबिंबित किया था, जिस पर स्वयं महात्मा गांधी ने बल दिया था। लेकिन नेहरू एक हिंदू थे जिन पर मुसलमान भरोसा कर सकते थे, दक्षिण भारत में एक उत्तर भारतीय का सम्मान था, और एक पुरुष जिसकी महिलाएं प्रशंसा करती थीं।

सहायक संधि :-(subsidiary alliance) :- start of British rule {ब्रिटिश शासन की शुरुआत}

सहायक संधि[subsidiary alliance]->

यह एक प्रकार की मैत्री संधि थी, जिसका प्रयोग 1798-1805 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे लॉर्ड वेलेजली ने भारत के देशी राज्यों के संबंध में किया था। इस संधि के प्रयोग से भारत में अंग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित हो गयी तथा नेपोलियन का भय भी टल गया। इस प्रणाली ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में विशिष्ट भूमिका का निर्वहन किया तथा इसके द्वारा अंग्रेजों को भारत में एक विस्तृत क्षेत्र की प्राप्ति हुई।

यद्यपि वैलेजली इस संस्था का आविष्कारक नहीं था। इस प्रणाली का अस्तित्व पहले से ही था तथा वह धीरे-धीरे विकसित हुई। संभवतः डूप्ले प्रथम यूरोपीय या जिसने इस संधि का प्रयोग पहली बार भारत में किया। कालांतर में वेलेजली ने इसे व्यापक रूप से अपनाया। इस संधि की विशेषतायें निम्नानुसार थीं:-

 🔥 भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कंपनी के अधीन होंगे। वे कोई युद्ध नहीं करेंगे तथा अन्य राज्यों से विचार-विमर्श कंपनी करेगी।

🔥 बड़े राज्य अपने यहां अंग्रेजी सेना रखेंगे, जिसकी कमान अंग्रेज अधिकारियोंके हाथों में होगी। यद्यपि ये राज्य उस सेना का खर्च उठायेंगे। 

🔥राज्यों को अपनी राजधानी में एक अंग्रेज रेजिडेंट रखना होगा। 

🔥 राज्य, कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रखेंगे।

🔥कंपनी, राज्य की शत्रुओं से रक्षा करेगी।

 🔥 कंपनी, राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

✨सबसे पहले यह संधि 1798 ई. में हैदराबाद के निजाम से की गई। फिर मैसूर (1799), तंजीर (अक्टूबर 1799), अवध (नवंबर 1801), पेशवा (दिसंबर 1801 ), बराड़ के भोसले (दिसंबर 1803), सिंधिया (फरवरी 1801), जोधपुर, जयपुर, मच्छेड़ी, बूंदी तथा भरतपुर के साथ की गयी।

 इस संधि द्वारा अंग्रेजों को अत्यधिक लाभ मिला किंतु, भारतीय रियासतों को अत्यधिक हानि उठानी पड़ी। उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गयी तथा वे अंग्रेजों की दया पर आश्रित हो गये। उन्हें आर्थिक बोझ भी वहन करना पड़ा। जिन राज्यों ने सहायक संधि स्वीकार की, उन पर इस व्यवस्था के दूरगामी । परिणाम हुए।

सोमवार, 29 मई 2023

🔥Swami Vivekananda's thoughts about India{ भारत के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार}

   स्वामी विवेकानंदः

इनका जन्म 1862 में हुआ। वे आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण रामकृष्ण के संपर्क में आये तथा उनके शिष्य बन गये। इन्होंने रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों को लोगों के बीच प्रचारित किया तथा इन्हें तत्कालीन भारतीय समाज के अनुरूप ज्यादा प्रासंगिक बनाने का प्रयास किया। वे नव-हिन्दूवाद के उपदेशक के रूप में उभरे। विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं एवं उपदेशों को प्रचारित करने के लिये 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण की शिक्षाओं, उपनिषद एवं गीता के दर्शन तथा बुद्ध एवं यीशु के उपदेशों को आधार बनाकर स्वामी विवेकानंद ने विश्व को मानव मूल्यों की शिक्षा दी। उन्होंने सामाजिक कर्म पर जोर दिया और कहा कि अगर ज्ञान के साथ जिस वास्तविक संसार में हम रहते हैं, उसमें कर्म न किया जाये तो ज्ञान निरर्थक है।



स्वामीविवेकानंद ने सर्वधर्म समभाव की घोषणा की और धार्मिक मामलों में हर प्रकार की भी संकीर्णता की निंदा की। 1898 में उन्होंने लिखा 'हमारी मात्रभूमि के लिये विश्व के दो महान धर्मों, हिन्दू एवं मुस्लिम की प्रणालियों का संगम ही एक मात्र आशा है। उन्होंने हिन्दू धर्म के पृथकतावादी सिद्धांत की आलोचना की तथा उसके 'मुझे मत दुओ के आदर्श को उसकी एक बड़ी भूल बताया। साधारण जनता के दुःख एवं कठिनाइयों से परिचित होने के लिये उन्होंने पूरे देश की यात्रा की तथा कहा "जिस एक मात्र ईश्वर पर में विश्वास करता हूँ... वह मेरा ईश्वर सब देशों का दुखी, पीड़ित और 'दरिद्रजन है'। उनके अनुसार, किसी भूखे को धार्मिक उपदेश देना, ईश्वर का अपमान करने जैसा है। उन्होंने देशवासियों से स्वतंत्रता, समानता एवं स्वतंत्र सोच धारण करने की अपील की।


,स्वामी विवेकानंद एक महान मानवतावादी व्यक्ति थे तथा उन्होंने रामकृष्ण मिशन के द्वारा मानवीय सहायता एवं सामाजिक कार्य को अपना सर्वप्रमुख उद्देश्य बनाया। मिशन ने सामाजिक एवं धार्मिक सुधार के अनेक कार्य किये। उन्होंने कर्मफल की सर्वोच्चता को प्रतिपादित करते हुए इसे ही सर्वश्रेष्ठ बताया। विवेकानंद ने जीव की सेवा की तुलना शिव की पूजा से की। उनके अनुसार जीवन स्वयं एक धर्म है। कर्म के द्वारा ही मानव का दैवीय अस्तित्व होता है। उन्होंने तत्कालीन तकनीक एवं आधुनिक विज्ञान का उपयोग मानवमात्र के कल्याण हेतु करने की महता प्रतिपादित की। विवेकानंद ने अपने मानवतावादी और कार्य सम्बंधी विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिये देश के विभिन्न भागों में रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखायें स्थापित की। इस मिशन ने लोगों के लिये स्कूल, पुस्तकालय, दयाखाने, अनाथालय इत्यादि की स्थापना की। विजन, विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं यया-बाद, सूखे एवं महामारी इत्यादि में भी लोगों की सहायता के लिये कार्य करता था। मिशन ने अंतर्राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप धारण किया। मिशन एक हिन्दू धार्मिक संगठन था किंतु इसने अन्य को भी महान बताया। आर्य समाज के विपरीत, मिशन ने मूर्तिपूजा का समर्थन किया। 

1 इसके अनुसार, मूर्तिपूजा, उपासना का उत्तम एवं सरल तरीका है। मूर्तिपूजा से आध्यात्मवाद का विकास बड़ी सरलता से किया जा सकता है। यह श्रेष्ठ है क्योंकि मूर्तिपूजा से कोई भी मनुष्य बहुत कम समय में ईश्वर की वंदना में निपुण हो सकता है। हिन्दू धर्म या वेदांत सर्वश्रेष्ठ है। इसकी सहायता से हिन्दू सच्चा हिन्दू एवं क्रिश्चियन सच्या क्रिश्चियन बन सकता है।


स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो (अमेरिका) में सम्पन्न विश्व धर्म सम्मेलन में लोगों को यह बताने का प्रयास किया कि वेदांत केवल हिन्दुओं का ही नहीं अपितु सभी मनुष्यों का धर्म है। उन्होंने आध्यात्मवाद एवं भौतिकतावाद के संतुलन पर बल दिया। इस सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यदि पश्चिम के भौतिकतावाद एवं पूर्व के आध्यात्मवाद का सम्मिश्रण कर दिया जाये तो यह मानव जाति की भलाई का सर्वोत्तम मार्ग होगा।


स्वामी विवेकानंद ने कभी लोगों को राजनीतिक संदेश नहीं दिया। उन्होंने देश की युवा पीढ़ी से अपील की कि वे भारत की प्राचीन सभ्यता पर गर्व करें तथा भविष्य में भारत की संस्कृति की मानव जाति के कल्याणार्थ समर्पित करें। वे भारत को एक जागृत एवं प्रगतिशील राष्ट्र बनाना चाहते थे वे जातिवाद, छुआछूत एवं विषमता को राष्ट्र के दुर्बल होने का महत्वपूर्ण कारक मानते थे उन्हें भारत की जनता की शक्ति में पूर्ण 1 आस्था थी। उनका विश्वास था कि एक दिन भारत का विकास होगा तथा देश से अशिक्षा एवं गरीबी पूरी तरह समाप्त हो जायेगी।



प्रसिद्ध लोकदेवता रामदेवजी

बाबा रामदेव:- सम्पूर्ण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में 'रामसा पीर', 'रुणीचा रा धणी' व '...